पिछले कुछ सालों से विश्व की जिन कंपनीज ने चीन में अपनी फैक्टरीज शुरू की थी, वे अब चीन से बाहर निकल रही हैं। आश्चर्यजनक यह है कि इनके लिए भारत आकर्षण का केंद्र नहीं है क्योंकि कुल 56 कंपनीज में से महज 3 कंपनीज ही भारत में अपने लिए जगह तलाश पाई हैं।
चीन में बढ़ती मजदूरी और सरकार के हस्तक्षेप का असर
रेटिंग कंपनी नोमुरा ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चीन में बढ़ती मजदूरी की लागत और शी जिनपिंग के पावर में आने के बाद सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप के रवैए से यह कंपनीज अपने लिए बेहतर विकल्प तलाश रही हैं।इसी वजह से इन्होंने चीन से बाहर जाने का फैसला किया है। इसके अलावा चीन से कोविड-19 के आउटब्रेक के कारण से भी कंपनीज को भारत या दक्षिण एशियाई देशों में जाने के लिए एक रास्ता दे दिया है।
26 कंपनीज ने वियतनाम और 11 ने ताइवान का रास्ता अपनाया
चीन से जो 56 कंपनीज अपने प्रोडक्शन को हटाई हैं उनमें से केवल 3 कंपनीज भारत में रिलोकेट हुई हैं जबकि 26 कंपनीज ने वियतनाम का रास्ता अपनाया तो 11 कंपनीज ने ताइवान को अपना केंद्र बना लिया। 8 कंपनीज ने थाईलैंड में अपना केद्र बनाया। हालांकि भारत को उम्मीद थी कि यंग डेमोग्राफिक्स और कम मजदूरी की दर से यह कंपनीज भारत में आएंगी, पर ऐसा नहीं हो पाया।
कम्युनिस्ट वाला देश है वियतनाम
जो ज्यादातर कंपनीज वियतनाम में गई हैं, वह मुख्य रूप से कम्युनिस्ट वाला देश है जो दक्षिणी चाइना की ओर है और लंबा समुद्री कोस्ट है जो काफी व्यस्त रहता है। वहां पर कई ऐसे फैक्टर्स हैं जो 10 करोड़ की आबादी वाले देश को काफी मदद करेंगे और साथ ही नई कंपनीज को भी आकर्षित करेंगे। यहां पर एक तो भौगोलिक और सांस्कृतिक फैक्टर्स कंपनीज के अनुकूल हैं और साथ ही राजनीतिक सिस्टम भी समान है जहां पर मात्र एक कम्युनिस्ट पार्टी वाला स्टेट है।
भारत के साथ शुरू किया था आर्थिक उदारीकरण का दौर
वियतनाम ने अपनी अर्थव्यवस्था में 1990 में उदारीकरण शुरू किया भारत की ही तरह और भारत के ही समय था। तब से वियतनाम ने 6-7 प्रतिशत की दर से वृद्धि की है जो भारत की तरह ही रहा है। पिछले तीन दशकों में हालांकि यह अर्थव्यवस्था की वृद्धि के मामले में भारत को पीछे नहीं कर पाया, लेकिन पिछले कुछ सालों से इसने चीन से बाहर निकलनेवाली कंपनीज का ज्यादा लाभ उठाया है। वियतनाम ने रेड टेप को कम किया, साथ ही इंफ्रा, एजुकेशन और स्वास्थ्य में जमकर निवेश किया। वियतनाम की मुद्रा में उतार-चढ़ाव भी काफी कम रहता है और इससे वह वर्ल्ड बैंक के बिजनेस करने में आसानी में भारत से मुकाबला कर पाता है। यही कारण है कि भारत की बजाय कंपनीज वियतनाम का रास्ता पकड़ लेती हैं।
भारत में तमाम समस्याएं हैं कंपनीज के लिए
दूसरी ओर भारत मेंयदि सरकार ने प्रोजेक्ट को क्लीयर कर भी दिया तो कंपनीज को फैक्टरी की जमीनों के लिए किसानों के साथ डील करनी पड़ती है। फिर उसे नौकरशाही के लंबे प्रावधानों सेभी गुजरना होता है। इसके बाद लोकल माफिया, माफिया से जुड़े एनजीओ और लोकल ट्रेड यूनियन के अलावा लेबरलॉ से भी इन कंपनीज को दो चार होना पड़ता है। हालांकि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार लेबल लॉ और अन्य मुद्दों को सुलझाने में लगी है, लेकिन अदालतों में इसके खिलाफ लंबी केस भी हैं।जिससे इसमें बाधा आ रही है। अगर मोदी सरकार इस गोल्डेन अवसर को छोड़ना नहीं चाहती है तो सरकार को इन सब मुद्दों को जल्द से जल्द सुलझाना होगा।
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