क्या होती है सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग? भारत पर इसका क्या असर पड़ता है - Tech News

Breaking

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Friday, 1 May 2020

क्या होती है सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग? भारत पर इसका क्या असर पड़ता है

कोरोनावायरस के कारण दुनियाभर की अर्थव्यवस्था मंद पड़ी है। इससे विकसित और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग में बदलाव की संभावना बढ़ गई है। रेटिंग एजेंसियों ने क्रेडिट रेटिंग घटने की चेतावनी जारी की है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। आइए जानते हैं कि सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग क्या होती है? इसको तय करना के क्या आधार है? और भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?


क्या होती है सॉवरेन रेटिंग?
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां विभिन्न देशों की सरकारों की उधार चुकाने की क्षमता के आधार पर सॉवरेन रेटिंग तय करती हैं। इसके लिए वह इकॉनोमी, मार्केट और राजनीतिक जोखिम को आधार मानती हैं। रेटिंग यह बताती है कि एक देश भविष्य में अपनी देनदारियों को चुका सकेगा या नहीं? यह रेटिंग टॉप इन्वेस्टमेंट ग्रेड से लेकर जंक ग्रेड तक होती हैं। जंक ग्रेड को डिफॉल्ट श्रेणी में माना जाता है।


आउटलुक रिवीजन से तय होती है रेटिंग
एजेंसियां आमतौर पर देशों की रेटिंग आउटलुक रिवीजन के आधार पर तय होती है। आउटलुक रिवीजन निगेटिव, स्टेबल और पॉजीटिव होता है। जिस देश का आउटलुक पॉजिटिव होता है, उसकी रेटिंग के अपग्रेड होने की संभावना ज्यादा रहती है। हालांकि, इसका उल्टा भी हो सकता है। सामान्य तौर पर इकॉनोमिक ग्रोथ, बाहरी कारण और सरकारी खजाने में ज्यादा बदलाव पर रेटिंग बदलती है।


सॉवरेन रेटिंग से पड़ता है ये असर
कई देश अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए दुनियाभर के निवेशकों से कर्ज लेते हैं। यह निवेशक कर्ज देने से पहले रेटिंग पर गौर करते हैं। एजेंसियां क्रेडिट रेटिंग तय करते वक्त समय पर मूलधन और ब्याज जुकाने की क्षमता पर फोकस करती हैं। ज्यादा रेटिंग पर कम जोखिम माना जाता है। इससे ज्यादा रेटिंग वाले देशों को कम ब्याज दरों पर कर्ज मिल जाता है।


भारत के लिए रेटिंग का महत्व
सामान्य तौर पर भारत सरकार विदेशी बाजारों से कर्ज नहीं लेती है। इसलिए क्रेडिट रेटिंग का ज्यादा महत्व नहीं है। लेकिन इसका असर सेंटीमेंट पर पड़ता है। कम रेटिंग के कारण स्टॉक मार्केट से विदेशी निवेशकों के बाहर जाने की संभावना बनी रहती है। इसके अलावा नए निवेश के बंद होने की आशंकी भी रहती है। इसके अलावा ईसीबी के जरिए रकम जुटाने वाले वित्तीय संस्थानों और कंपनियों की उधारी लागत बढ़ जाती है।


यह एजेंसियां करती हैं रेटिंग
आमतौर पर पूरी दुनिया में स्टैंडर्ड एंड पूअर्स (एसएंडपी), फिच और मूडीज इन्वेस्टर्स ही सॉवरेन रेटिंग तय करती हैं। एसएंडपी और फिच रेटिंग के लिए बीबीबी+ (BBB+) को मानक रखती हैं, जबकि मूडीज का मानक बीएए3 (Baa3) है। यह सबसे ऊंची रेटिंग है जो इन्वेस्टमेंट ग्रेड को दर्शाती है।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
What is a sovereign credit rating? How does it affect india


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3d9lBA8

No comments:

Post a Comment

Pages