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Friday, 31 July 2020

पीपीएफ जैसी छोटी बचत योजनाओं से लोगों का मोहभंग, कम ब्याज के बावजूद बैंक खातों में जमा बढ़ी

सामान्य तौर पर बेहतर रिटर्न देने वाले एसेट्स में सेविंग की राशि का निवेश किया जाता है। जब ब्याज दरें ज्यादा थीं तो बैंक फिक्स डिपॉजिट में ज्यादा निवेश किया जाता था। हालांकि, मौजूदा समय में विरोधाभासी हालात हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, 'अब नकारात्मक वास्तविक ब्याज दर नॉर्म क्यों बन गई हैं।' एसबीआई के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्या कांति घोष की ओर से तैयार की गई रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि नकारात्मक वास्तविक ब्याज दरों के बावजूद लोगों ने अपनी सेविंग बढ़ा दी है। लेकिन लोग एहतियात के तौर पर पैसे बचाकर बैंक खातों में जमा कर रहे हैं।

भारत के पास घरेलू बचत का बड़ा अनुभव

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास घरेलू बचत का बड़ा अनुभव है। विशेष रूप से माना जाता है कि जब वास्तविक ब्याज दर सकारात्मक होती है तो सेविंग बढ़ जाती है और खर्च को भविष्य के लिए स्थगित कर दिया जाता है। हालांकि, ऐसी स्थिति में बचतकर्ता सेविंग के दम पर मौजूदा खपत में बढ़ोतरी कर देता है। दिलचस्प बात यह है कि कमर्शियल बैंकों में स्मॉल सेविंग डिपॉजिट का प्रतिशत काफी कम हो गया है। इसका कारण यह है कि लोग अपनी कमाई को वित्तीय सेविंग स्कीम में लॉक कराने के बजाए उन्हें लिक्विड रूप में बैंक में जमा करना पसंद कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि लोग घरेलू बचत को चयनित इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश कर रहे हैं। इसमें स्टॉक मार्केट भी शामिल है।

ब्याज दर नकारात्मक होने के बावजूद ज्यादा सेविंग महत्वपूर्ण सबक

वास्तविक ब्याज दर के नकारात्मक होने के बावजूद ज्यादा सेविंग की यह विरोधाभासी स्थिति भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण सबक है। देश का बचत अनुभव बताता है कि वित्त वर्ष 2000 से 2020 के बीच वास्तविक डिपॉजिट रेट में कम से कम 2 फीसदी की वृद्धि के लिए सेविंग रेट में 1 फीसदी के बदलाव की आवश्यकता थी। यह परिणाम पहले के परिणामों के अनुरूप है जो वास्तविक दरों में बड़े बदलावों को दिखाता है। यह घरेलू बचत को बढ़ाने के लिए हमेशा आवश्यक होते हैं। वास्तव में स्मॉल सेविंग में छोटे से परिवर्तन से शायद ही कोई फर्क पड़ता है। इसलिए महत्वपूर्ण अवधि के लिए वास्तविक ब्याज दरों को ऊंचा रखना हमेशा महंगा होता है।

पहले भी ब्याज दरों में कमी की गई

रिपोर्ट के मुताबिक, अतीत में भी ऐसा हुआ है जब मुद्रास्फीति को कम रखने के लिए ब्याज दरों में कमी कई गई है। इस प्रकार यह आवश्यक है कि हम वास्तविक ब्याज दरों को नकारात्मक रखें। इससे एसेट्स की गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। हम वर्तमान हालातों पर भरोसा करते हैं और यह वित्तीय बाजारों के लिए उपयुक्त है। इसका कारण यह है कि वास्तविक नकारात्मक ब्याज दर से घरेलू वित्तीय बचत को नुकसान नहीं होगा। कोरोना महामारी के कारण पैदा हुए अनिश्चित हालातों में यह काफी जरूरी है।



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वास्तविक नकारात्मक ब्याज दर से घरेलू वित्तीय बचत को नुकसान नहीं होगा और कोरोना महामारी के कारण पैदा हुए अनिश्चित हालातों में यह काफी जरूरी है।


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